Thursday, 04-06-2026
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हाईकोर्ट ने बरेली एसएसपी, एसपी और प्रेमनगर SHO से मांगा जवाब, 29 अप्रैल को अगली सुनवाई

पत्रकार मयूर तलवार प्रकरण में हाईकोर्ट सख्त, बरेली पुलिस के अफसर तलब




इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली एसएसपी, एसपी और प्रेमनगर SHO से मांगा जवाब, 29 अप्रैल को अगली सुनवाई




इलाहाबाद हाईकोर्ट।

पत्रकार मयूर तलवार से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार, बरेली के एसएसपी, एसपी सिटी बरेली मानुष पारिख, थाना प्रेमनगर के प्रभारी निरीक्षक (SHO) और प्रवीण शंखधार समेत सभी संबंधित पक्षकारों को जवाब दाखिल करने के लिए तलब किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

झूठे मुकदमे और हमले के गंभीर आरोप

याचिकाकर्ता पत्रकार मयूर तलवार ने हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ थाना प्रेमनगर में क्राइम नंबर 260/25 के तहत लूट और हत्या के प्रयास (हाफ मर्डर) जैसी गंभीर धाराओं में झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया। याचिका में यह भी कहा गया है कि संपत्ति विवाद के चलते उन पर दबाव बनाया गया और जान से मारने की नीयत से फायरिंग जैसी घटनाएं भी हुईं, जिनकी निष्पक्ष जांच नहीं की गई।

हाईकोर्ट में दाखिल याचिका

मामले को लेकर क्रिमिनल मिस. रिट पिटिशन संख्या 15363/2025 दाखिल की गई है, जिसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के साथ-साथ याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है। याचिका के स्वीकार होने के बाद मामला अब सीधे न्यायिक निगरानी में आ गया है।

राज्य सरकार को अंतिम मौका

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश अपर महाधिवक्ता (AGA) को दो सप्ताह का अंतिम अवसर देते हुए काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अब किसी भी तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

29 अप्रैल को अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल 2026 के लिए सूचीबद्ध करते हुए निर्देश दिए कि इस दौरान किसी भी पक्ष को प्रताड़ित न किया जाए। सुनवाई के दौरान बरेली पुलिस प्रशासन, विशेष रूप से एसपी सिटी की भूमिका को लेकर जवाबदेही तय होने के संकेत भी मिले हैं।

क्यों अहम है मामला

यह प्रकरण केवल एक पत्रकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर मामला माना जा रहा है। इस केस के फैसले पर मीडिया स्वतंत्रता और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।

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